व्हिसलब्लोअर संरक्षण कानून: कानून बना, सुरक्षा आज भी अधूरी।
लेखक: शिखर, अधिवक्ता — उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ
लोकतंत्र में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के विरुद्ध आवाज उठाने वाले व्यक्ति को भ्रष्टाचार की सूचना उजागर करने वाला व्यक्ति (व्हिसलब्लोअर) कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति अक्सर व्यवस्था के भीतर रहकर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता और प्रशासनिक कदाचार को उजागर करते हैं। इसलिए उनकी पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित करना सुशासन की अनिवार्य शर्त है।
भारत में भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं का पर्दाफाश करने वालों के संरक्षण संबंधी अधिनियम, 2014 संसद द्वारा पारित किया गया और राष्ट्रपति की स्वीकृति भी प्राप्त हुई, लेकिन यह कानून आज तक प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सका, क्योंकि इसके लिए आवश्यक अधिसूचना जारी नहीं हुई। वर्ष 2015 में इसमें संशोधन का प्रयास भी हुआ, लेकिन संबंधित विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो सका और बाद में समाप्त हो गया।
यह स्थिति गंभीर प्रश्न खड़ा करती है—जब संसद कानून बना चुकी है तो उसे लागू करने में एक दशक से अधिक की देरी क्यों?
इस कानून की उपयोगिता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भ्रष्टाचार की जानकारी प्रायः उन्हीं लोगों को होती है जो सरकारी या सार्वजनिक संस्थाओं के भीतर कार्य करते हैं। लेकिन शिकायत करने पर उन्हें स्थानांतरण, विभागीय कार्रवाई, पदावनति या अन्य प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए केवल शिकायत का अधिकार पर्याप्त नहीं; शिकायतकर्ता को प्रतिशोध से कानूनी सुरक्षा भी आवश्यक है।
सूचना के अधिकार के कार्यकर्ताओं और भ्रष्टाचार उजागर करने वालों के मामलों ने भी यह साबित किया है कि सूचना सामने लाने वाले नागरिकों की सुरक्षा एक वास्तविक आवश्यकता है। वर्तमान में कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएँ, जैसे लोकपाल एवं केंद्रीय सतर्कता आयोग के अंतर्गत सार्वजनिक हित में सूचना देने वाले शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा संबंधी व्यवस्था, मौजूद हैं, लेकिन एक व्यापक वैधानिक सुरक्षा कानून का अपना महत्व है।
सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील सूचनाओं को सुरक्षित रखने की चिंता उचित है। लेकिन कानून में ऐसे अपवाद इतने व्यापक नहीं होने चाहिए कि भ्रष्टाचार को “गोपनीयता” की आड़ में छिपाया जा सके।
एक प्रभावी कानून में तीन बातें अनिवार्य होनी चाहिए—
पहली, शिकायतकर्ता की पहचान की गोपनीयता;
दूसरी, शिकायत के कारण होने वाली प्रतिशोधात्मक कार्रवाई पर कठोर रोक; और
तीसरी, स्वतंत्र एवं समयबद्ध जाँच।
भ्रष्टाचार की सूचना उजागर करने वाला व्यक्ति व्यवस्था के लिए खतरा नहीं, बल्कि व्यवस्था का प्रहरी है। यदि सच बोलने वाले को सुरक्षा नहीं मिलेगी तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल कागजों और भाषणों तक सीमित रह जाएगी।
इसलिए समय आ गया है कि सरकार लंबित प्रक्रिया को समाप्त कर एक मजबूत, संतुलित और प्रभावी भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं की सूचना उजागर करने वालों के संरक्षण संबंधी कानून को लागू करे।
क्योंकि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को उजागर करने वाला व्यक्ति संरक्षण का अधिकारी है, प्रताड़ना का नहीं।
शिखर
अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ।
