*उत्तर प्रदेश में गलत वाहन चालान: प्रशासनिक लापरवाही, नागरिक अधिकारों का हनन और कानूनी जवाबदेही का प्रश्न|*

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*उत्तर प्रदेश में गलत वाहन चालान: प्रशासनिक लापरवाही, नागरिक अधिकारों का हनन और कानूनी जवाबदेही का प्रश्न|*

*उत्तर प्रदेश में ई-चालान प्रणाली को आधुनिक और पारदर्शी यातायात प्रवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया गया था।* किंतु जब किसी निर्दोष नागरिक के वाहन पर गलत चालान आरोपित कर दिया जाता है, *तब यह प्रणाली कानून के शासन के बजाय प्रशासनिक मनमानी का प्रतीक बन जाती है।*

आज अनेक नागरिक ऐसे हैं जिनके वाहनों पर उन स्थानों के चालान दर्ज हो जाते हैं जहाँ वे कभी गए ही नहीं। कई मामलों में फोटो में वाहन संख्या स्पष्ट नहीं होती, कई बार वाहन का मॉडल ही अलग होता है, और कई बार कैमरों द्वारा गलत नंबर पढ़े जाने के कारण निर्दोष व्यक्ति को अपराधी बना दिया जाता है। प्रश्न यह है कि क्या केवल एक मशीन की त्रुटि किसी नागरिक को दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 राज्य को मनमानी करने से रोकता है तथा समानता का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। जब बिना पर्याप्त सत्यापन के किसी नागरिक पर आर्थिक दंड आरोपित किया जाता है, तब यह इन संवैधानिक गारंटियों पर प्रत्यक्ष आघात है।

प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पूर्व विश्वसनीय साक्ष्य होना चाहिए। यदि चालान जारी करने वाली एजेंसी वाहन संख्या, वाहन मॉडल, स्थान एवं अन्य तथ्यों का समुचित सत्यापन नहीं करती, तो ऐसा चालान विधिसम्मत कार्रवाई नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है।

सबसे गंभीर प्रश्न जवाबदेही का है। यदि नागरिक की गलती पर तत्काल जुर्माना लगाया जा सकता है, तो फिर अधिकारी की गलती पर दंड क्यों नहीं? गलत चालान जारी करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, प्रतिकूल प्रविष्टि तथा क्षतिपूर्ति की व्यवस्था होनी चाहिए। अन्यथा पूरी व्यवस्था “दंड नागरिक को, गलती सरकार की” के सिद्धांत पर चलती रहेगी।

कानूनी दृष्टि से पीड़ित नागरिक निम्नलिखित उपाय अपना सकता है—

1. ई-चालान पोर्टल पर आपत्ति दर्ज करना।

2. संबंधित पुलिस आयुक्त, यातायात पुलिस अथवा परिवहन विभाग को लिखित शिकायत देना।

3. सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत चालान जारी करने के आधार, कैमरा रिकॉर्ड और सत्यापन प्रक्रिया की जानकारी मांगना।

4. गंभीर मामलों में उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका दायर करना।

5. यदि प्रशासनिक लापरवाही से आर्थिक अथवा अन्य क्षति हुई हो तो क्षतिपूर्ति की मांग करना।

वास्तव में गलत चालान केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं है। यह प्रशासनिक दक्षता, विधिक उत्तरदायित्व और नागरिक सम्मान की परीक्षा है। सरकार यदि डिजिटल शासन का दावा करती है, तो उसे डिजिटल त्रुटियों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी।

जब तक गलत चालान जारी करने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक निर्दोष नागरिक सरकारी डेटाबेस में अपराधी बनते रहेंगे और न्याय के नाम पर केवल शिकायतों के चक्कर काटते रहेंगे।

लोकतंत्र में तकनीक नागरिक की सेवक होनी चाहिए, स्वामी नहीं। यदि मशीन की गलती से नागरिक दंडित होने लगे, तो यह कानून का शासन नहीं बल्कि एल्गोरिद्मिक अन्याय कहलाएगा।

अधिवक्ताओं के लिए एक अतिरिक्त कानूनी तर्क यह भी है कि बार-बार गलत चालान जारी होना प्रशासनिक लापरवाही और मनमानी का संकेत माना जा सकता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत चुनौती दी जा सकती है। उपयुक्त मामलों में क्षतिपूर्ति की मांग भी न्यायालय के समक्ष उठाई जा सकती है।

*“क्रांतिकारी वकील की कलम से।”*