इकाना के पास मल्टीलेवल पार्किंग में देरी: विकास या प्रशासनिक उदासीनता?

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इकाना के पास मल्टीलेवल पार्किंग में देरी: विकास या प्रशासनिक उदासीनता?

लखनऊ के तेजी से विकसित हो रहे गोमती नगर विस्तार क्षेत्र में स्थित इकाना स्टेडियम आज अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और बड़े जनसमूह का प्रमुख केंद्र बन चुका है। लेकिन विडंबना यह है कि करोड़ों रुपये की परियोजनाओं का दावा करने वाला लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) आज भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या—पार्किंग और यातायात अव्यवस्था—का स्थायी समाधान नहीं दे पाया है।

इकाना स्टेडियम के पास प्रस्तावित मल्टीलेवल पार्किंग परियोजना वर्षों से चर्चाओं, फाइलों और घोषणाओं में घूम रही है, लेकिन धरातल पर इसकी गति कछुए से भी धीमी दिखाई देती है। परिणामस्वरूप किसी भी बड़े मैच, कार्यक्रम या आयोजन के दौरान हजारों वाहन सड़कों पर बेतरतीब खड़े हो जाते हैं और पूरा क्षेत्र घंटों जाम की गिरफ्त में आ जाता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब प्रशासन को पहले से पता है कि इकाना क्षेत्र में नियमित रूप से भारी भीड़ एकत्रित होती है, तो फिर पार्किंग निर्माण में यह देरी क्यों? क्या यह केवल प्रशासनिक अक्षमता है, या फिर परियोजनाओं को जानबूझकर लंबित रखने की पुरानी सरकारी संस्कृति?

यातायात पुलिस को हर बड़े आयोजन पर अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ते हैं, स्थानीय निवासी परेशान होते हैं, आपातकालीन वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती है और आम नागरिक घंटों सड़क पर फंसकर अपना समय एवं ईंधन बर्बाद करते हैं। इसका आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसान भी कम नहीं है।

एलडीए को यह समझना होगा कि विकास केवल ऊंची इमारतें खड़ी करने का नाम नहीं है। यदि मूलभूत सुविधाएं समय पर उपलब्ध नहीं कराई जातीं, तो विकास के दावे खोखले प्रतीत होते हैं। मल्टीलेवल पार्किंग जैसी आवश्यक परियोजना में विलंब सीधे-सीधे प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न खड़ा करता है।

प्रदेश सरकार और एलडीए को चाहिए कि इस परियोजना की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक करें, निर्माण में हुई देरी के कारणों को स्पष्ट करें और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करें। यदि परियोजना स्वीकृत है तो उसके लिए निश्चित समय-सीमा घोषित कर जनता को आश्वस्त किया जाए।

लखनऊ को विश्वस्तरीय शहर बनाने की बात तभी सार्थक होगी, जब योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर समय पर दिखाई दें। अन्यथा इकाना के आसपास लगने वाला जाम प्रशासनिक विफलता का स्थायी स्मारक बनकर खड़ा रहेगा।

शिखर
अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ।