अलीगंज कोचिंग सेंटर अग्निकांड: क्या यह केवल दुर्घटना थी या प्रशासनिक विफलता?
अलीगंज स्थित कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग, जिसमें छात्रों की जान चली गई और अनेक परिवारों के सपने राख में बदल गए, केवल एक दुखद दुर्घटना भर नहीं मानी जा सकती। यह घटना उन गंभीर प्रश्नों को जन्म देती है जिनका उत्तर प्रशासन, विकास प्राधिकरणों और नियामक संस्थाओं को देना होगा।
यदि भवन निर्माण, अग्नि सुरक्षा, पार्किंग, आपातकालीन निकास, विद्युत व्यवस्था अथवा अन्य सुरक्षा मानकों में किसी प्रकार की कमी थी और संबंधित विभागों ने समय रहते उसका संज्ञान नहीं लिया, तो यह प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला है। किसी भी शहर में विकास प्राधिकरण का दायित्व केवल नक्शे स्वीकृत करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि नागरिकों, विशेषकर छात्रों और बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
यह अत्यंत चिंताजनक है कि अनेक बार अवैध निर्माण, मानकों के विपरीत उपयोग तथा सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की शिकायतें होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक संबंधित अधिकारी अक्सर मौन रहते हैं। किंतु जब निर्दोष लोगों की जान चली जाती है, तब केवल जांच समिति गठित कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
लखनऊ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता शिखर ने भी समय-समय पर अपने लेखों और सार्वजनिक विचारों के माध्यम से उत्तर प्रदेश अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट में व्यापक सुधार तथा कठोर संशोधन की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने बार-बार यह मांग उठाई है कि विकास प्राधिकरणों में व्याप्त भ्रष्टाचार, नियमों की अनदेखी तथा अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कठोर कानूनी प्रावधान बनाए जाएँ। उनके अनुसार यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या कर्तव्यहीनता के कारण जनहानि होती है, तो उसके विरुद्ध केवल विभागीय कार्रवाई नहीं बल्कि कठोर वैधानिक दंड का भी प्रावधान होना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि अलीगंज कोचिंग सेंटर अग्निकांड की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कर यह निर्धारित किया जाए कि भवन की स्वीकृति, निरीक्षण, सुरक्षा प्रमाणन तथा निगरानी की प्रक्रिया में किस स्तर पर चूक हुई। यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति की लापरवाही सामने आती है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
मृत छात्रों को वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन उनकी स्मृति में ऐसा तंत्र अवश्य बनाया जा सकता है जिसमें भविष्य में किसी भी परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि भविष्य की त्रासदियों को रोकना भी है। अलीगंज की यह घटना उत्तर प्रदेश की शहरी नियोजन व्यवस्था और विकास प्राधिकरणों की जवाबदेही पर पुनर्विचार करने का अवसर है, जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
शिखर
अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ।
