नौकरशाही के सत्ता-दुरुपयोग पर लगाम के लिए अलग कानून आवश्यक।
-शिखर, अधिवक्ता,
भारत में लोकतंत्र की मजबूती केवल अच्छे कानून बनाने से नहीं, बल्कि सरकारी शक्तियों के निष्पक्ष और जवाबदेह इस्तेमाल से सुनिश्चित होती है। संविधान ने नौकरशाही को जनता की सेवा और कानून के क्रियान्वयन के लिए अधिकार दिए हैं, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध, दबाव या मनमानी के लिए। इसलिए समय आ गया है कि भारत में ‘लोक पदाधिकारी शक्ति-दुरुपयोग निवारण एवं जवाबदेही कानून’ बनाया जाए।
भ्रष्टाचार से भी गंभीर है शक्ति का दुरुपयोग,
भ्रष्टाचार की चर्चा प्रायः रिश्वत और आर्थिक अनियमितताओं तक सीमित रहती है। लेकिन किसी वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल गलत उद्देश्य से करना भी गंभीर समस्या है। किसी अधिकारी द्वारा दुर्भावनापूर्वक नोटिस जारी करना, लाइसेंस रोकना, जांच शुरू करना या किसी नागरिक को अनावश्यक प्रशासनिक कार्रवाई में उलझाना सत्ता के दुरुपयोग का रूप हो सकता है।
प्रश्न यह है कि सरकारी शक्ति का इस्तेमाल कानून लागू करने के लिए हुआ या किसी व्यक्ति से हिसाब चुकता करने के लिए?
वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों के पास व्यापक प्रशासनिक अधिकार और निर्णय लेने की शक्ति होती है। अधिकांश अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं, लेकिन यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा व्यक्तिगत मतभेद, संस्थागत संघर्ष या प्रतिशोध के कारण इन शक्तियों का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता है।
किसी नागरिक को केवल इसलिए प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उसने किसी अधिकारी के निर्णय पर सवाल उठाया, शिकायत की या न्यायालय की शरण ली। पद की वरिष्ठता किसी अधिकारी को जवाबदेही से छूट नहीं देती।
प्रस्तावित कानून में क्या प्रावधान हों?,
इस कानून में शक्ति के दुरुपयोग की स्पष्ट परिभाषा होनी चाहिए। इसमें व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए कार्रवाई, दुर्भावनापूर्ण जांच, भेदभावपूर्ण व्यवहार, बिना उचित कारण अनुमति रोकना, न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवहेलना, रिकॉर्ड की अनदेखी तथा अधीनस्थ अधिकारियों पर गैरकानूनी निर्देश लागू करने का दबाव डालना शामिल हो।
प्रत्येक गंभीर प्रशासनिक निर्णय के पीछे स्पष्ट कारण, संबंधित दस्तावेज और कानूनी आधार दर्ज होना चाहिए। ‘ऊपर से आदेश है’ किसी अन्यायपूर्ण निर्णय का पर्याप्त औचित्य नहीं हो सकता।
स्वतंत्र जांच और कठोर दंड,
केंद्र और राज्यों में स्वतंत्र प्रशासनिक जवाबदेही प्राधिकरण स्थापित किया जा सकता है। वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों की जांच उनके अधीनस्थों के प्रशासनिक दबाव से मुक्त होनी चाहिए।
यदि निष्पक्ष जांच में जानबूझकर शक्ति-दुरुपयोग सिद्ध हो, तो मामले की गंभीरता के अनुसार विभागीय दंड, पदोन्नति पर रोक, आर्थिक क्षतिपूर्ति और गंभीर मामलों में आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही, अधिकारियों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों से बचाने के लिए उचित सुरक्षा भी आवश्यक है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 समानता तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं। प्रशासनिक कार्रवाई भी कानून, निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
भारत में नौकरशाही को कमजोर करना उद्देश्य नहीं, बल्कि उसे अधिक जवाबदेह बनाना आवश्यक है। जब छोटे कर्मचारी की गलती पर कार्रवाई हो सकती है, तो वरिष्ठ पद पर बैठे अधिकारी के जानबूझकर किए गए दुरुपयोग की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
लोकतंत्र में अधिकारी का पद बड़ा हो सकता है, लेकिन उसकी शक्ति संविधान से बड़ी नहीं हो सकती।
भारत को ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था चाहिए जिसमें अधिकार हों, लेकिन मनमानी नहीं; निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो, लेकिन व्यक्तिगत प्रतिशोध की छूट नहीं। कानून का वास्तविक शासन तभी स्थापित होगा, जब कानून लागू करने वाले अधिकारी भी कानून के प्रति समान रूप से जवाबदेह होंगे।
