सरकारी अधिकारियों का सेवा-विस्तार समाप्त हो-शिखर अधिवक्ता हाईकोर्ट लखनऊ

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सरकारी अधिकारियों का सेवा-विस्तार समाप्त हो-शिखर अधिवक्ता हाईकोर्ट लखनऊ

भारत में प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता,पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं। सरकारी अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें दो वर्ष तक सेवा-विस्तार देने की व्यवस्था पर गंभीर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। जब किसी अधिकारी को निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु के बाद भी पद पर बने रहने का अवसर मिलता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह निर्णय वास्तव में जनहित, विशेषज्ञता और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर लिया जा रहा है, या इससे कुछ अधिकारियों को विशेष लाभ पहुँचाने की संभावना पैदा होती है?

सेवा-विस्तार का औचित्य तभी स्वीकार्य हो सकता है, जब वह असाधारण परिस्थितियों में, स्पष्ट मानदंडों के आधार पर और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर दिया जाए। लेकिन यदि यह व्यवस्था सामान्य परंपरा बन जाए, तो इससे प्रशासनिक निष्पक्षता और संस्थागत विश्वसनीयता प्रभावित होने का खतरा रहता है।

वरिष्ठ अधिकारियों को विशेष लाभ, कनिष्ठ अधिकारियों के अवसर सीमित।

सरकारी सेवा में पदोन्नति केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्षों की सेवा, अनुभव और कार्यक्षमता से जुड़ी प्रक्रिया है। जब किसी वरिष्ठ अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी पद पर बनाए रखा जाता है, तो उस पद पर नियुक्ति या पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे अन्य अधिकारियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। इससे कनिष्ठ अधिकारियों में असंतोष पैदा हो सकता है और उन्हें यह संदेश मिल सकता है कि संस्थागत नियमों की तुलना में व्यक्तिगत प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण है।

ऐसी स्थिति में प्रशासनिक व्यवस्था में नई सोच, नेतृत्व परिवर्तन और उत्तरदायित्व की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है। हालांकि इसका प्रभाव प्रत्येक पद और सेवा-संवर्ग में अलग-अलग होगा, इसलिए इसे बिना जाँच के हर मामले में समान परिणाम मानना उचित नहीं है।

प्रतिद्वंद्वी अधिकारियों से हिसाब चुकता करने का खतरा।

इस व्यवस्था का सबसे गंभीर संभावित दुष्परिणाम प्रशासनिक प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत वैमनस्य से जुड़ा है। किसी वरिष्ठ अधिकारी को अतिरिक्त कार्यकाल मिलने पर उसके पास निर्णय लेने, अधीनस्थों के कार्यों का मूल्यांकन करने, विभागीय जाँचों को प्रभावित करने या अधिकारियों की तैनाती और जिम्मेदारियों से संबंधित प्रक्रियाओं में भूमिका निभाने का अवसर बना रह सकता है।

यदि ऐसा अधिकारी निष्पक्षता और पेशेवर आचरण के बजाय व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से प्रभावित हो, तो सेवा-विस्तार की अवधि का इस्तेमाल अपने आलोचकों, प्रतिद्वंद्वियों या असहमति रखने वाले अधिकारियों के विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई के लिए किए जाने की आशंका पैदा होती है। किसी अधिकारी के विरुद्ध अनुचित विभागीय जाँच, प्रतिकूल मूल्यांकन, महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी से हटाने या पदस्थापना को प्रभावित करने जैसी परिस्थितियाँ प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर सकती हैं।

यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रत्येक सेवा-विस्तार प्राप्त अधिकारी ऐसा करता है, यह मानने का कोई आधार नहीं है। चिंता व्यवस्था में मौजूद उस संभावित जोखिम की है, जिसे प्रभावी निगरानी, पारदर्शिता और स्वतंत्र शिकायत-निवारण के अभाव में नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।,

राजनीतिक निकटता और प्रशासनिक स्वतंत्रता पर प्रश्न?

यदि सेवा-विस्तार के निर्णयों में वस्तुनिष्ठ मानदंडों के बजाय व्यक्तिगत समीकरणों या राजनीतिक निकटता की भूमिका होने लगे, तो अधिकारियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। अधिकारी यह महसूस कर सकते हैं कि उनके भविष्य के अवसर नियमों और प्रदर्शन से अधिक शक्तिशाली व्यक्तियों की संतुष्टि पर निर्भर हैं। इससे स्वतंत्र निर्णय लेने, अनुचित निर्देशों का विरोध करने और कानून के अनुसार कार्रवाई करने की संस्थागत क्षमता कमजोर पड़ने का जोखिम है।

लोकतांत्रिक शासन में अधिकारी का दायित्व किसी व्यक्ति विशेष को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि संविधान, कानून और जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है। इसलिए सेवा-विस्तार की प्रक्रिया को किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत या राजनीतिक संरक्षण की आशंका से मुक्त रखना आवश्यक है।

जवाबदेही और प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता

सेवा-विस्तार का एक अन्य प्रश्न जवाबदेही से संबंधित है। यदि किसी अधिकारी को अतिरिक्त समय दिया जाता है, तो उसके पिछले कार्यकाल के प्रदर्शन, लंबित मामलों, प्रशासनिक परिणामों और सेवा-विस्तार की वास्तविक आवश्यकता का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए। केवल अनुभव या वरिष्ठता को पर्याप्त आधार नहीं माना जाना चाहिए।

साथ ही, निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु के बाद पद पर बने रहने से संबंधित निर्णयों के कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए, जहाँ कानून और आवश्यक गोपनीयता इसकी अनुमति दें। निर्णयों की समीक्षा, हितों के टकराव की रोकथाम और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के विरुद्ध सुरक्षा जैसे उपाय अनिवार्य होने चाहिए।

दो वर्ष की सेवा-वृद्धि समाप्त करने की आवश्यकता।

केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के नियमों में सामान्य सेवानिवृत्ति के बाद सेवा-विस्तार को नियमित अधिकार नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तों के अधीन अपवाद माना गया है। विभाग के 9 दिसंबर 2002 के कार्यालय ज्ञापन में भी असाधारण परिस्थितियों में ही ऐसे विस्तार पर विचार करने की नीति का उल्लेख है। वहीं, कुछ विशिष्ट वरिष्ठ पदों के लिए लागू नियम अलग प्रावधान करते हैं।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि देश के प्रत्येक सरकारी अधिकारी को स्वतः दो वर्ष का सेवा-विस्तार मिलता है। लेकिन जहाँ नियमों के तहत अतिरिक्त कार्यकाल दिया जा सकता है, वहाँ उसका दायरा सीमित करने और मनमाने विस्तार पर रोक लगाने की आवश्यकता पर गंभीर विचार होना चाहिए।

सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि सामान्यतः निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु पर अधिकारी अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त हों। किसी अत्यंत विशिष्ट तकनीकी आवश्यकता या असाधारण जनहित की स्थिति में ही सीमित अपवाद की अनुमति दी जाए। ऐसे प्रत्येक निर्णय के कारण लिखित हों, स्वतंत्र समीक्षा हो और नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी रहे।

निष्कर्ष: व्यक्ति नहीं, व्यवस्था सर्वोपरि हो।

लोकतांत्रिक प्रशासन किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत सुविधा पर निर्भर नहीं रह सकता। यदि किसी पद के लिए उत्तराधिकारी समय पर तैयार नहीं है, तो यह प्रशासनिक नियोजन की कमी है, जिसे सेवानिवृत्ति के बाद अधिकारियों को लगातार पद पर बनाए रखकर स्थायी समाधान नहीं बनाया जाना चाहिए।

सेवा-विस्तार की अस्पष्ट या अत्यधिक उदार व्यवस्था से पदोन्नति के अवसर सीमित हो सकते हैं, अधिकारियों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है और व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता को प्रशासनिक निर्णयों में जगह मिलने का जोखिम पैदा हो सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं कोई अधिकारी अपने अतिरिक्त कार्यकाल का इस्तेमाल कानून और जनहित के बजाय अपने प्रभाव को बनाए रखने या अपने विरोधियों से हिसाब चुकता करने के लिए न करे।

सरकार को सेवा-विस्तार की सामान्य परंपरा समाप्त करने, अपवादों को सख्ती से सीमित करने और प्रत्येक निर्णय को सार्वजनिक हित तथा निष्पक्षता की कसौटी पर परखने की नीति अपनानी चाहिए। सरकारी पद किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं हैं। उनका उद्देश्य जनता की सेवा करना है। प्रशासन की विश्वसनीयता इसी में है कि सेवानिवृत्ति, पदोन्नति और नियुक्ति के नियम व्यक्ति विशेष की इच्छा नहीं, बल्कि निष्पक्ष संस्थागत व्यवस्था के अनुसार लागू हों।

शिखर

अधिवक्ता।